शनिवार, 27 मई 2017

सुलझने की बजाय उलझ गया मथुरा का डबल मर्डर और लूट कांड, व्‍यापारियों की नीयत पर भी उठने लगे सवाल

मथुरा की कोयला वाली गली में ”मयंक चेन” नाम ज्‍यूलिरी फर्म पर हुए डबल मर्डर तथा करोड़ों रुपए की लूट का मामला अब सुलझने की बजाय और अधिक उलझ गया है। साथ ही इस जघन्‍य कांड के बाद सक्रिय हुए कुछ व्‍यापारियों की नीयत पर भी पुलिस से मिलीभगत को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
आज विभिन्‍न अखबारों में छपी खबर और पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक फर्म के मालिक मयंक सहित तीन लोगों को घायल करके उनके भाई विकास व व्‍यापारी मेघ अग्रवाल की हत्‍या करने वाले लुटेरों की नजर से वहां पड़ा सोने व नकदी से भरा एक बैग छूट गया था। इस बैग को लुटेरों के निकल जाने पर घायल कर्मचारी मोहम्‍मद अली ने एक पड़ोसी सर्राफ के पास यह कहकर रख दिया कि यह मेरा है और इसे मैं हॉस्‍पीटल से लौटने के बाद ले जाऊंगा।
यह भी बताया जा रहा है कि मोहम्‍मद अली को एक नहीं बल्‍कि दो बैग अशोक शाहू नामक मेरठ के कारीगर ने दिए थे जो वारदात के वक्‍त दुकान में मौजूद था और बदमाशों के हमले में वह भी घायल हुआ था। मोहम्‍मद अली को दिए गए दूसरे बैग में क्‍या था और उसका क्‍या हुआ, इसका फिलहाल कुछ पता नहीं है।
बहरहाल, पुलिस का कहना है कि वारदात के अगले ही दिन यह बैग मिल गया था जिसे पांच व्‍यापारियों की कमेटी के सामने इस शर्त पर सीओ सिटी जगदीश सिंह ने मृतक मेघ अग्रवाल के पिता को सौंपा कि इसे ”बरामदगी मानते हुए” जरूरत पड़ने पर प्रस्‍तुत किया जाएगा।
यहां सबसे पहला सवाल तो यह खड़ा होता है कि पुलिस को इस बैग के बारे में सूचना किसने दी और कैसे पुलिस उस सर्राफ तक पहुंची जिसके यहां मोहम्‍मद अली ने बैग रखा था।
पुलिस की मानें तो सीओ सिटी जगदीश सिंह को वारदात की सीसीटीवी फुटेज चैक करते वक्‍त दिखाई दिया कि एक बैग अशोक शाहू के नीचे दबा पड़ा है।
पुलिस की बात सच भी मान ली जाए तो यह प्रश्‍न बाकी रह जाता है कि सीओ सिटी को पड़ोसी सर्राफ के यहां बैग रखे होने की जानकारी किससे मिली।
पुलिस कहती है कि शक के आधार पर उसने हॉस्‍पीटल में एडमिट घायल मोहम्‍मद अली और अशोक शाहू से जब उस बैग के बारे में पूछताछ की तो उन्‍होंने बताया कि एक बैग पड़ोसी सर्राफ के यहां रखा है।
पुलिस यह भी कहती है कि इस बीच मोहम्‍मद अली की पत्‍नी और उसका बेटा उस सर्राफ के यहां बैग लेने पहुंचे थे क्‍योंकि मोहम्‍मद अली व अशोक शाहू की माल को लेकर नीयत खराब हो गई किंतु तब तक चूंकि पुलिस को पता लग चुका था इसलिए उसने सर्राफ को बैग किसी अन्‍य के हवाले न करने की हिदायत दे दी।
दूसरी ओर व्‍यापारी नेताओं का कहना है कि पुलिस ने कोई बैग बरामद नहीं किया लिहाजा वह पुलिस का गुडवर्क नहीं है। पुलिस को तो उन्‍होंने ही सोने से भरा एक बैग छूट जाने तथा पड़ोसी सर्राफ के यहां से मिल जाने की सूचना दी थी। सच्‍चाई जो भी हो, परंतु इतना तय है कि पुलिस के संज्ञान में वारदात के अगले ही दिन सोने से भरा एक बैग मिल जाने की बात आ चुकी थी।
इन दोनों ही स्‍थितियों में बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि वारदात के अगले ही दिन एक बैग मिल जाने का पता लग जाने के बावजूद पुलिस ने तीसरे दिन मथुरा आए प्रदेश के डीजीपी सुलखान सिंह और मुख्‍यमंत्री के प्रतिनिधि व प्रदेश के ऊर्जा मंत्री व मथुरा के विधायक श्रीकांत शर्मा को क्‍यों नहीं दी जबकि वह पीड़ित परिवारों के साथ-साथ व्‍यापारियों के जबर्दस्‍त आक्रोश को चुपचाप झेलते रहे।
यदि डीजीपी वहां अपने स्‍तर से इस बात की सूचना देते तो कुछ आक्रोश कम अवश्‍य होता। दूसरे दिन ही एक बैग मिल जाने का पता लगने के बाद क्‍या सीओ सिटी अगले दिन डीजीपी के आने व उनके द्वारा अपने निलंबन की घोषणा किए जाने का इंतजार कर रहे थे।
आश्‍चर्य इस बात पर भी होता है कि डीजीपी सुलखान सिंह तथा ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को मेघ अग्रवाल के परिवार ने भी बैग मिल जाने की जानकारी देना क्‍यों जरूरी नहीं समझा जबकि यह बात तो व्‍यापारी व सीओ सिटी दोनों स्‍वीकार कर रहे हैं कि बैग अगले दिन यानि 16 मई को ही मिल गया था और डीजीपी व ऊर्जा मंत्री का मथुरा दौरा 17 तारीख की सुबह हुआ है।
पुलिस तथा व्‍यापारी नेताओं की कहानी में एक बड़ा झोल इस बात को लेकर लगता है कि माल से भरे बैग पर यदि मोहम्‍मद अली तथा अशोक शाहू की नीयत खराब हो चुकी थी और मोहम्‍मद अली ने अपनी पत्‍नी व बेटे को सर्राफ के यहां बैग लेने भी भेजा था तो पुलिस ने अब तक उन्‍हें आरोपी क्‍यों नहीं बनाया।
दो हत्‍याएं करके करोड़ों का माल लूट ले जाने वाले और उसी माल में से किसी तरह छूट गए माल पर नीयत खराब करने वालों में क्‍या कोई अंतर है?
नहीं है तो पुलिस और व्‍यापारी नेता दोनों ही मोहम्‍मद अली व अशोक शाहू पर मेहरबान क्‍यों हैं।
इन सबके अतिरिक्‍त एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न यह भी है कि जिस हिसाब से लुटेरों ने दुकान में घुसने के साथ ही ताबडतोड़ गोलीबारी शुरू कर दी और वारदात को अंजाम देकर भागते वक्‍त भी गली में खड़ी गाय व कुत्‍ते के ऊपर तक फायर झोंके, छतों से झांक रहे लोगों तक पर निशाना साधा, उसके बाद भी वह सर्राफ क्‍या लुटेरों की निगाह से बचे बैग को मोहम्‍मद अली से लेने के लिए बैठा रहा। वो भी तब जबकि गोलीबारी होने के साथ ही कोयला वाली गली ही नहीं, पूरे छत्‍ता बाजार में भगदड़ मच गई थी और दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें बंद करके भाग खड़े हुए थे।
इस सबके बावजूद यह मान भी लिया जाए कि किसी तरह वह सर्राफ बैठा रह गया तो भी क्‍या कोई व्‍यक्‍ति इतनी बड़ी व जघन्‍य वारदात के बाद एक कर्मचारी के कहने पर सोने व नकदी से भरा बैग उसके मात्र इतना कहने पर रख लेगा कि यह उसका है और हॉस्‍पीटल से लौटकर वह उसे ले जाएगा। क्‍या कोई व्‍यक्‍ति इस तरह के माहौल में खुद को बिना वजह परेशानी में डालना मुनासिब समझेगा।
अगर बैग रखने वाले सर्राफा व्‍यवसाई को बहुत दिलेर भी मान लिया जाए तो पुलिस ने अपनी तरफ से न तो उसका नाम उजागर किया और न यह बताया कि उसने अच्‍छा काम किया या बुरा।
अच्‍छा काम किया तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए थी और गलत काम किया है तो उसे भी लूट के बाद हुए घटनाक्रम में षड्यंत्र का आरोपी बनाना चाहिए क्‍योंकि उसने लगभग चौबीस घंटों तक बैग अपने पास छिपाकर रखा ही क्‍यों। हालांकि पब्‍लिक में अब उस सर्राफ का नाम सार्वजनिक हो चुका है।
अमर उजाला में इस बावत एसएसपी विनोद मिश्रा के हवाले से छपी खबर के अनुसार एसएसपी को मृतक मेघ अग्रवाल के पिता ने उनके पास पहुंच कर यह बात बताई कि उनके पुत्र का सोने व नकदी से भरा बैग उन्‍हें मिल गया है।
अगर यह बात सही है तो एसएसपी ने भी इतनी बड़ी बात अपने किसी उच्‍च अधिकारी अथवा मीडिया को बताना क्‍यों जरूरी नहीं समझा, और क्‍यों एसएसपी को भी बैग मिलने की जानकारी सीओ सिटी अथवा किसी अन्‍य अधीनस्‍थ से न मिलकर मेघ अग्रवाल के पिता से मिली। उस बैग के मिलने में ऐसा क्‍या था कि अधीनस्‍थ अधिकारी ने एसएसपी को भी उसके बारे में सूचित करना उचित नहीं समझा।
बताया जाता है कि बैग मिलने का खुलासा दरअसल कल तब हुआ जब मेघ अग्रवाल के परिजन होलीगेट पर भूख हड़ताल एवं धरना प्रदर्शन करने बैठ गए और विकास के परिजनों को इसकी भनक तक नहीं लगी।
विकास के परिजनों ने तब इस बात को आधार बनाकर आक्रोश व्‍यक्‍त किया कि मेघ का कथित माल तो उसके परिवार को दे दिया गया और मेघ व विकास की हत्‍या का खुलासा साथ ही होगा, ऐसे में वह अकेले अब यह सब किसलिए कर रहे हैं।
विकास के परिवार से जुड़े सूत्रों का यह भी कहना है कि बिना किसी जांच के यह कैसे मान लिया गया कि बदमाशों की नजर से छूटा बैग मेघ अग्रवाल का ही था। यह ठीक है कि मेघ अग्रवाल मयंक चेन को माल देता था और उस दिन भी माल देने ही आया था लेकिन बिना जांच के उस माल पर मेघ अग्रवाल के परिजनों का हक कैसे मान लिया गया।
यह भी तो हो सकता है कि मेघ अग्रवाल मयंक चेन के लिए लाए गए माल को उनके हवाले कर चुका हो, एसे में उस माल पर हक मेघ का न होकर मयंक चेन का बनता है।
इस संबंध में व्‍यापारी नेताओं का कहना था कि सोने के हर आभूषण पर उसे बनाने वाली कंपनी का ब्रांड नेम अंकित होता है और उसी आधार पर यह मान लिया गया कि माल मेघ अग्रवाल का है।
इसके जवाब में दूसरे सर्राफा कारोबारी बताते हैं कि ब्रांड किसी का भी हो किंतु उस पर हक तो उसे खरीदने वाली फर्म का होता है। जब मेघ अग्रवाल मयंक चेन के लिए सामान लाया था और वारदात के वक्‍त वहीं बैठा था तो बिना जांच के उस पर मेघ अग्रवाल के परिजनों का हक मान लेना अनुचित है।
वारदात से ठीक पहले के वीडियो फुटेज भी शो करते हैं कि दुकान पर मौजूद सभी लोग इत्‍मीनान के साथ बैठे हैं और सामान्‍य बातचीत में मशगूल हैं। लेनदेन होने जैसी कोई गतिविधि उसमें कहीं दिखाई नहीं देती।
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में कुछ ऐसे तत्‍वों ने भूमिका अदा की है जिनकी पुलिस से अत्‍यंत निकटता है और मयंक चेन की अपेक्षा मेघ अग्रवाल के परिजनों से अधिक सहानुभूति।
इन्‍हीं तत्‍वों ने एक सोची समझी योजना के तहत डीजीपी सुलखान सिंह तथा ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को घटना स्‍थल पर जाने से रोका और इन्‍हीं तत्‍वों ने सर्राफा कमेटी के स्‍थानीय पदाधिकारियों को भी उनसे मुलाकात तक नहीं करने दी जबकि पहले यह दोनों कार्यक्रम डीजीपी व ऊर्जा मंत्री के दौरे में शामिल थे।
यह भी पता लगा है कि मौका ए वारदात पर सबसे पहले पहुंचने वालों में एक ऐसा सर्राफा व्‍यवसाई था जिसके कर्मचारी को सरेराह गोली मारकर कुछ वर्ष पूर्व नामजद बदमाश भारी मात्रा में सोने के आभूषण तथा नकदी लूट ले गए थे। तब इस सर्राफा व्‍यवसाई ने घटना के बाद लूटे गए माल की कोई जानकारी पुलिस को नहीं दी और सारा जोर आभूषणों के साथ मौजूद कागजों की बरामदगी पर लगाया, परिणाम स्‍वरूप पकड़े जाने के उपरांत भी बदमाश भारी मात्रा में आभूषण व नकदी पचा गए।
पुलिस को शक है कि मयंक चेन पर भी हत्‍या व लूट को अंजाम उन्‍हीं बदमाशों ने दिया है।
यहां इस बात का जिक्र करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि मयंक चेन पर हुए डबल मर्डर व लूट के बाद छूटे गए बैग की बरामदगी में उक्‍त सर्राफ की बड़ी भूमिका बताई जाती है जबकि घटना वाले दिन से पूरी तरह पीड़ित परिवारों के पक्ष में खड़े रहने वाले सर्राफा कमेटी के स्‍थानीय पदाधिकारियों को छूटे गए बैग की कोई जानकारी नहीं दी गई। और तो और मेघ अग्रवाल के पिता को जिन पांच व्‍यापारियों की कमेटी बनाकर उनका कथित माल सौंपा गया, उस कमेटी में भी सर्राफा कमेटी का एक भी व्‍यक्‍ति शामिल नहीं किया गया और न यह बताया कि सपुर्दगी कमेटी में शामिल पांच व्‍यापारी कौन-कौन से हैं।
खबरों के मुताबिक पुलिस-प्रशासन ने कल मेघ अग्रवाल के परिजनों को 48 घंटों में घटना के अनावरण का आश्‍वासन देकर भूख हड़ताल व धरने से उठाने पर राजी किया, जिसमें से 24 घंटे से अधिक बीत चुके हैं।
वहीं प्रदेश के डीजीपी ने उनके आश्‍वासन के बाद भी मेघ अग्रवाल के परिजनों द्वारा धरना देने की बात पर अपनी कोई टिप्‍पणी करने से इंकार कर दिया।
दूसरी ओर आज प्रदेश की सर्राफा कमेटी के आह्वान पर प्रदेश भर के सर्राफा कारोबारियों ने बंद रखा है। स्‍थानीय व्‍यापारी और सर्राफा कमेटी के लोगों ने भी आज मथुरा के जिलाधिकारी अरविंद एम बंगारी से मुलाकात कर अपना रोष व्‍यक्‍त किया है।
हो सकता है कि पुलिस प्रशासन मेघ अग्रवाल के परिजनों को दिए गए समय के अंदर ही वारदात का खुलासा कर दे लेकिन वह वारदात के बाद पैदा हुए घटनाक्रम तथा छूटे गए बैग की कहानी के पीछे का सच बता पाएगी, यह कहना मुश्‍किल है।
पुलिस द्वारा अब तक अख्‍तियार किया गया रवैया तो कतई ऐसे कोई संकेत नहीं देता कि वह पूरे माल की बरामदगी करके असली अपराधियों को बेनकाब कर पाएगी। पुलिस को तो फिलहाल खुद ही नहीं पता कि मयंक चेन से बदमाश आखिर कितना माल लूट ले जाने में सफल रहे और छूटे गए बैग को छिपाकर रखने वालों की असली मंशा क्‍या थी।
बदमाशों की कुल संख्‍या को लेकर पुलिस पहले दिन से कनफ्यूज है ही।
अंधेरे में तीर चलाना पुलिस की कार्यप्रणाली का हिस्‍सा बन चुका है और वह इस मामले में भी वही कर रही है।
यही कारण है कि हर वारदात के बाद अगली वारदात कहीं अधिक जघन्‍य व कहीं अधिक दुस्‍साहसिक होती है। तो इंतजार कीजिए और देखिए आगे-आगे होता है क्‍या।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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